जिंदिगी है मेरी उन अल्फाज़ के मानिंद जो बहते पानी पे लिखे जाते हैं,
उम्र बस इतनी है की लिखे जाने से पहले ही मिट जाते हैं
रहमत है उनकी उन अब्र के मानिंद जो बेहिसाब बरस जाते है ,
यां कुछ ऐसे हैं के धानी रंग लाते हैं और कुछ ख़ाक रह जाते हैं
आरज़ू-ऐ-जिंदिगी है मेरी उस शबनम के मानिंद जो किब्ल सहर गुलों पे आती है ,
उजालों में शोहरत तो चमन की होती है शबनम कफूर हो जाती है
राही हूँ ज़िन्दगी है मेरी उस सफर के मानिंद जिसमे सेहरा पार किए जाते है
यां कुछ ऐसे मकाम हैं जिनपे ठेहरे तो राह भटक जाते है
उनके इनाम थे हम पे
हम कदरदानों में से न हो सके