Wednesday, May 13, 2009

Few of my 'shaers' I could pen down

Friends call it a bad habit in me.. I say a gud shaer but never pen them down... So on request of my dear friend Satyam , I'm making a collection of my shaers over here ... These are few lucky ones I could record ..


जिंदिगी है मेरी उन अल्फाज़ के मानिंद जो बहते पानी पे लिखे जाते हैं,
उम्र बस इतनी है की लिखे जाने से पहले ही मिट जाते हैं

रहमत है उनकी उन अब्र के मानिंद जो बेहिसाब बरस जाते है ,
यां कुछ ऐसे हैं के धानी रंग लाते हैं और कुछ ख़ाक रह जाते हैं

आरज़ू-ऐ-जिंदिगी है मेरी उस शबनम के मानिंद जो किब्ल सहर गुलों पे आती है ,
उजालों में शोहरत तो चमन की होती है शबनम कफूर हो जाती है

राही हूँ ज़िन्दगी है मेरी उस सफर के मानिंद जिसमे सेहरा पार किए जाते है
यां कुछ ऐसे मकाम हैं जिनपे ठेहरे तो राह भटक जाते है

उनके इनाम थे हम पे
हम कदरदानों में से न हो सके




















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